निर्भया का असली कातिल अवनींद्र पांडेय ही है !

असली कातिल अवनींद्र पांडेय ही है ! निर्भया उर्फ़ स्वर्गीय ज्योति सिंह को न्याय आखिर कब मिलेगा ? यह सवाल अभी तक बना हुआ है लेकिन इस बीच हम यह जान लेने का दावा तो करते है कि पवन सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और अक्षय ठाकुर ने ही उसका बलात्कार कर उसकी शरीर को बुरी तरह से चोटिल कर दिया जिससे वह मौत तक जा पहुँची। उनको लगातार फाँसी के फंदे से बचाने वाले ए पी सिंह पर भी सवाल उठाये जा सकते जो दैत्याचारी शुक्राचार्य की तरह अपने दानव शिष्यों को संरक्षित करने में लगा हुआ फिर चाहे वह अनैतिक रूप से ही हो और फिर चाहे बतौर वकील खुद के प्रोफेशन पर बाटता ही क्यों न लग जाए।

निर्भया के हत्यारों की फाँसी तीसरी बार टल चुकी है और उसे इन्साफ दिलाने में प्रयासरत सीमा कुशवाहा ने तो अब साफ़ तौर पर कह दिया है कि यह सिस्टम बुरी तरह से सड़ चुका है। फ़ाइनल डेट आने से पहली और आने के बाद भी फाँसी पर रोक लग जाती है क्योंकि यह दरिंदे कभी क्यूरेटिव पेटिशन तो कभी क्षमा याचिका दायर कर देता है जिसके चलते वह बच जाते है जबकि वास्तव में असली मुजरिम तो कोई और है।

अगर वह मुजरिम उस दिन ज्योति सिंह उर्फ़ निर्भया को बस तक ले जाने वाला अवनींद्र पांडेय ही है जो कि या तो इन दरिंदो के साथ मिला हुआ था या फिर वह एक हवसी इंसान था जिसके लिए उससे सच्चा प्यार करने वाली लड़की ज्योति सिंह केवल एक टाइम पास की चीज़ थी और उसकी मासूमियत का इस्तेमाल करते हुए वह धोखे से उसे बस में ले जाता है जहाँ पर उसका सामूहिक बलात्कार किया जाता है, उसका गला दबाया जाता है और साथ ही उसे निजी अंगो में लोहे की रॉड डाल दी जाती है और वह अंत में ज़िन्दगी की लड़ाई लड़ते हुए दम तोड़ देती है अपने अंतिम कथन के साथ कि उसके हत्यारो को सजा हर हाल में मिलनी चाहिए।

शुरू में तो निर्भया के साथ हुई दर्दिंगी के बारे में अपना मुँह फाड़ने के लिए मसालेदार खबरें परोसने वाले टीवी न्यूज़ चैनल्स पर आ जाता है और इस तरह से बुरी घटना का विवरण देता है जैसे उस वक़्त सच में उसे मार पीट के बाँध दिया गया और वह असहाय डरपोक की तरह उसे बचा ही न सका। अवनींद्र पांडेय की इस बायत को आप बेशक मान लीजिये लेकिन दूसरी बार गौर से सोचने पर आपको पता चल सकेगा कि यह वह सच में ऐसे ही ज़िंदा बच निकल सकता था भी ? बिलकुल नहीं! पहले यह बात समझ के स्वीकार तक कर लेने चाहिए कि वास्तव में वह अवनींद्र ही था जिसने ज्योति को अपने बस तक पहुँचाने का काम किया और इस दौरान कोई हार उस घोर काली रात्रि को दिल्ली की सुनसान सड़को पर मौजूद नहीं था।

फिर खाली बस को देख के उसे कुछ अजीब नहीं लगा कि यहाँ कुछ गड़बड़ है ? इसमें केवल मर्द ही है और एक अकेली लड़की के साथ होना खतरे से खाली नहीं है ? अपने झूठे प्यार के नाम पर हवस की चाहत पूरी करने के लिए एक सुनसान सड़क पर खड़ी एक खाली बस में सफर करना क्या सही कदम था ? अवनींद्र पांडेय आखिर बच कैसे निकला ? वह आज मस्ती से अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहा है और बतौर इंजीनियर नोएडा में कार्यत है। आज उसकी ज़िन्दगी में कोई लड़की आ चुकी है और बिना शक के कहा जा सकता है उसके लिए निर्भया को न्याय को मिलना या न मिलना कोई मायने नहीं रखता है।

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हम सब इतना भलीभांति जानते है कि वह आज शादी भी कर चुका है और अपनी ज़िन्दगी नए तरीके से गुज़ार रहा है। क्या उस दिन खौफनाक वारदात का नाट्य रूपांतरण करवाते वक़्त किसी तरह के दर्द, दुःख या चिंता से गुज़रता दिखा ? क्या कोर्ट के बाहर उसने अपनी प्रेमिका के लिए इन्साफ की लड़ाई लड़ी ? धक्क ! धिक्कार है तुम पर अवनींद्र पांडेय जो तुम अपनी प्रेमिका ज्योति सिंह को केवल अस्पताल पहुंचा कर अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हैट गए और ज़िन्दगी फिर से जीने लगे। तुम जानते थे कि वह मर जाएगी फिर भी तुमने उसको बचाते-बचाते खुद की जान को दांव पर लगा देने की ज़ेहमियत नहीं उठाई क्योंकि उसके असली कातिल तुम ही हो ! हाँ तुम ही हो उसके कातिल…..तुमने उसकी मौत की कहानी को बेचा वह बड़ी बेशर्मी से टीवी न्यूज़ चैनल्स पर बैठ कर और इंटरव्यू के नाम पर इसका रेट लगाया 50 हज़ार प्रति घंटा …..वाह ! तुम्हारे जैसे कातिल आशिक़ भला ऐसे ही थोड़े न बच के निकल सकते है।

जिस दिन भी उन दरिंदो को फाँसी का फंदा नसीब होगा उस दिन भी ज्योति सिंह की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी क्योंकि तुमने ही प्यार के नाम पर उसे विश्वास में लिया और उसे उन दरिंदो के पास ले गए और वह इस अंध्विश्वास में थी कि तुम उसे बचाओगे पर तुम उसे मरवा चुके थे इसलिए तुम्हारे गुनाहो की सुनवाई और उसका साबित उस दिन तक लंबित है जब तक तुम्हे भी फाँसी नहीं दे दी जाती। लोग इतिहास में इसे पढ़ सके या न पढ़ सके किन्तु सच यही है कि निर्भया का असली कातिल अवनींद्र पांडेय ही है।

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